वाल्मीकि रामायण 6.57.45
वेगितानां समर्थानामन्योन्यवधकाङ्क्षिणाम् ।परस्परं चाह्वयतां निनादः श्रूयते महान्॥
vegitānāṃ samarthānāmanyonyavadhakāṅkṣiṇām |parasparaṃ cāhvayatāṃ ninādaḥ śrūyate mahān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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