वाल्मीकि रामायण 6.94.1
स प्रविश्य सभां राजा दीनः परमदुःखितः।निषसादासने सिंहः क्रुद्ध इव श्वसन्॥
sa praviśya sabhāṃ rājā dīnaḥ paramaduḥkhitaḥ |niṣasādāsane siṃhaḥ kruddha iva śvasan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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