वाल्मीकि रामायण 7.111.3
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।नित्यं शृण्वन्ति सन्तुष्टाः दिव्यं रामायणं दिवि॥
tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ |nityaṃ śṛṇvanti santuṣṭāḥ divyaṃ rāmāyaṇaṃ divi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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