वाल्मीकि रामायण 7.13.15
स दृष्ट्वा तत्र राजानं दीप्यमानं स्वतेजसा ।जयेति वाचा सम्पूज्य तूष्णीं समभिवर्तत॥
sa dṛṣṭvā tatra rājānaṃ dīpyamānaṃ svatejasā |jayeti vācā sampūjya tūṣṇīṃ samabhivartata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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