वाल्मीकि रामायण 7.13.27
पैङ्गल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूपनिरीक्षणात् ।प्रीतो ऽस्मि तव धर्मज्ञ तपसा नेन सुव्रत॥
paiṅgalyaṃ yadavāptaṃ hi devyā rūpanirīkṣaṇāt |prīto 'smi tava dharmajña tapasā nena suvrata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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