वाल्मीकि रामायण 7.13.42
एवं कृतस्वस्त्ययनो रथमारुह्य रावणः ।त्रैलोक्यविजयाकाङ्क्षी ययौ यत्र धनेश्वरः॥
evaṃ kṛtasvastyayano rathamāruhya rāvaṇaḥ |trailokyavijayākāṅkṣī yayau yatra dhaneśvaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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