वाल्मीकि रामायण 7.32.72
राक्षसांस्त्रासयित्वा तु कार्तवीर्यो ऽर्जुनस्तदा ।रावणं गृह्य नगरं प्रविवेश सुहृद्वृतः॥
rākṣasāṃstrāsayitvā tu kārtavīryo 'rjunastadā |rāvaṇaṃ gṛhya nagaraṃ praviveśa suhṛdvṛtaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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