वाल्मीकि रामायण 7.35.1
अपृच्छत तदा रामो दक्षिणाशाश्रमं मुनिम् ।प्राञ्जलिर्विनयोपेत इदमाह वचो ऽर्थवत्॥
apṛcchata tadā rāmo dakṣiṇāśāśramaṃ munim |prāñjalirvinayopeta idamāha vaco 'rthavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें