वाल्मीकि रामायण 7.47.17
पादच्छायामुपागम्य सुखमस्य महात्मनः ।उपवासपरैकाग्रा वस त्वं जनकात्मजे॥
pādacchāyāmupāgamya sukhamasya mahātmanaḥ |upavāsaparaikāgrā vasa tvaṃ janakātmaje ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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