वाल्मीकि रामायण 7.47.2
सुमन्त्रं चैव सरथं स्थीयतामिति लक्ष्मणः ।उवाच शोकसन्तप्तः प्रयाहीति च नाविकम्॥
sumantraṃ caiva sarathaṃ sthīyatāmiti lakṣmaṇaḥ |uvāca śokasantaptaḥ prayāhīti ca nāvikam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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