वाल्मीकि रामायण 7.47.8
किमिदं नावगच्छामि ब्रूहि तत्त्वेन लक्ष्मण ।पश्यामि त्वां न च स्वस्थमपि क्षेमं महीपतेः॥
kimidaṃ nāvagacchāmi brūhi tattvena lakṣmaṇa |paśyāmi tvāṃ na ca svasthamapi kṣemaṃ mahīpateḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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