वाल्मीकि रामायण 7.5.3
वरदानकृतैश्वर्यं सा तं प्राप्य पतिं प्रियम् ।आसीद्देववती तुष्टा धनं प्राप्येव निर्धनः॥
varadānakṛtaiśvaryaṃ sā taṃ prāpya patiṃ priyam |āsīddevavatī tuṣṭā dhanaṃ prāpyeva nirdhanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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