वाल्मीकि रामायण 7.52.3
सौमित्रिस्तु परं दैन्यं जगाम सुमहामतिः ।रामपादौ समासाद्य वक्ष्यामि किमहं गतः॥
saumitristu paraṃ dainyaṃ jagāma sumahāmatiḥ |rāmapādau samāsādya vakṣyāmi kimahaṃ gataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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