वाल्मीकि रामायण 7.64.3
अन्तरा पणवीथ्यश्च नानापण्योपशोभिताः ।अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं तथैव नटनर्तकाः॥
antarā paṇavīthyaśca nānāpaṇyopaśobhitāḥ |anugacchantu kākutsthaṃ tathaiva naṭanartakāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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