वाल्मीकि रामायण 7.69.40
ततो हि देवा ऋषिपन्नगाश्च प्रपूजिरे ह्यप्सरसश्च सर्वाः ।दिष्ट्या जयो दाशरथेरवाप्तस्त्यक्त्वा भयं सर्प इव प्रशान्तः॥
tato hi devā ṛṣipannagāśca prapūjire hyapsarasaśca sarvāḥ |diṣṭyā jayo dāśaratheravāptastyaktvā bhayaṃ sarpa iva praśāntaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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