वाल्मीकि रामायण 7.72.2
तस्य शब्दं सुमधुरं तन्त्रीलयसमन्वितम् ।श्रुत्वा रात्रिर्जगामाशु शत्रुघ्नस्य महात्मनः॥
tasya śabdaṃ sumadhuraṃ tantrīlayasamanvitam |śrutvā rātrirjagāmāśu śatrughnasya mahātmanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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