वाल्मीकि रामायण 7.83.17
उवाच च शुभं वाक्यं कैकेय्यानन्दवर्धनम् ।प्रीतो ऽस्मि परितुष्टो ऽस्मि तवाद्य वचने ऽनघ॥
uvāca ca śubhaṃ vākyaṃ kaikeyyānandavardhanam |prīto 'smi parituṣṭo 'smi tavādya vacane 'nagha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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