वाल्मीकि रामायण 7.84.10
स निक्षिप्य सुतं ज्येष्ठं पौरेषु मधुरेश्वरम् ।तप उग्रं समातिष्ठत्तापयन्सर्वदेवताः॥
sa nikṣipya sutaṃ jyeṣṭhaṃ paureṣu madhureśvaram |tapa ugraṃ samātiṣṭhattāpayansarvadevatāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें