वाल्मीकि रामायण 7.95.14
राजानश्च महात्मानः प्रशंसन्ति स्म राघवम् ।उपपन्नं नरश्रेष्ठ त्वय्येव भुवि नान्यतः॥
rājānaśca mahātmānaḥ praśaṃsanti sma rāghavam |upapannaṃ naraśreṣṭha tvayyeva bhuvi nānyataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें