वाल्मीकि रामायण 7.97.15
यथा ऽहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये ।तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति॥
yathā 'haṃ rāghavādanyaṃ manasāpi na cintaye |tathā me mādhavī devī vivaraṃ dātumarhati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें