महाभारत 1.1.175
देवाह्वयः सुप्रतिमः सुप्रतीको बृहद्रथःमहोत्साहो विनीतात्मा सुक्रतुर्नैषधो नलः
devāhvayaḥ supratimaḥ supratīko bṛhadrathaḥmahotsāho vinītātmā sukraturnaiṣadho nalaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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