महाभारत 1.1.27
निष्प्रभेऽस्मिन्निरालोके सर्वतस्तमसावृतेबृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजमक्षयम्
niṣprabhe'sminnirāloke sarvatastamasāvṛtebṛhadaṇḍamabhūdekaṃ prajānāṃ bījamakṣayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें