महाभारत 1.10.4
एकानर्थान्पृथगर्थानेकदुःखान्पृथक्सुखान्डुण्डुभान्धर्मविद्भूत्वा न त्वं हिंसितुमर्हसि
ekānarthānpṛthagarthānekaduḥkhānpṛthaksukhānḍuṇḍubhāndharmavidbhūtvā na tvaṃ hiṃsitumarhasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें