महाभारत 1.11.4
यथावीर्यस्त्वया सर्पः कृतोऽयं मद्बिभीषयातथावीर्यो भुजंगस्त्वं मम कोपाद्भविष्यसि
yathāvīryastvayā sarpaḥ kṛto'yaṃ madbibhīṣayātathāvīryo bhujaṃgastvaṃ mama kopādbhaviṣyasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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