महाभारत 1.110.20
नाहं श्वाचरिते मार्गे अवीर्यकृपणोचितेस्वधर्मात्सततापेते रमेयं वीर्यवर्जितः
nāhaṃ śvācarite mārge avīryakṛpaṇocitesvadharmātsatatāpete rameyaṃ vīryavarjitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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