महाभारत 1.110.5
तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमात्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयायां दुरात्मनः
tasyādya vyasane buddhiḥ saṃjāteyaṃ mamādhamātyaktasya devairanayānmṛgayāyāṃ durātmanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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