महाभारत 1.112.34
तथा त्वमपि मय्येव मनसा भरतर्षभशक्तो जनयितुं पुत्रांस्तपोयोगबलान्वयात्
tathā tvamapi mayyeva manasā bharatarṣabhaśakto janayituṃ putrāṃstapoyogabalānvayāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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