महाभारत 1.113.42
तस्माद्धर्मं पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मितेउपचाराभिचाराभ्यां धर्ममाराधयस्व वै
tasmāddharmaṃ puraskṛtya niyatā tvaṃ śucismiteupacārābhicārābhyāṃ dharmamārādhayasva vai
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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