महाभारत 1.115.2
न मेऽस्ति त्वयि संतापो विगुणेऽपि परंतपनावरत्वे वरार्हायाः स्थित्वा चानघ नित्यदा
na me'sti tvayi saṃtāpo viguṇe'pi paraṃtapanāvaratve varārhāyāḥ sthitvā cānagha nityadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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