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महाभारत 1.115.7
पाण्डुरुवाचममाप्येष सदा माद्रि हृद्यर्थः परिवर्ततेन तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया
pāṇḍuruvācamamāpyeṣa sadā mādri hṛdyarthaḥ parivartatena tu tvāṃ prasahe vaktumiṣṭāniṣṭavivakṣayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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