महाभारत 1.120.5धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन चभृशं संतापयामास देवराजं स गौतमःdhanurvedaparatvācca tapasā vipulena cabhṛśaṃ saṃtāpayāmāsa devarājaṃ sa gautamaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें