महाभारत 1.13.18
ज्ञातुमिच्छामहे ब्रह्मन्को भवानिह धिष्ठितःकिमर्थं चैव नः शोच्याननुकम्पितुमर्हसि
jñātumicchāmahe brahmanko bhavāniha dhiṣṭhitaḥkimarthaṃ caiva naḥ śocyānanukampitumarhasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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