महाभारत 1.13.35
सूत उवाच · sūta uvāca
मात्रा हि भुजगाः शप्ताः पूर्वं ब्रह्मविदां वरजनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः
mātrā hi bhujagāḥ śaptāḥ pūrvaṃ brahmavidāṃ varajanamejayasya vo yajñe dhakṣyatyanilasārathiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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