महाभारत 1.13.42
देवांश्च तर्पयामास यज्ञैर्विविधदक्षिणैःऋषींश्च ब्रह्मचर्येण संतत्या च पितामहान्
devāṃśca tarpayāmāsa yajñairvividhadakṣiṇaiḥṛṣīṃśca brahmacaryeṇa saṃtatyā ca pitāmahān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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