महाभारत 1.13.43
अपहृत्य गुरुं भारं पितॄणां संशितव्रतःजरत्कारुर्गतः स्वर्गं सहितः स्वैः पितामहैः
apahṛtya guruṃ bhāraṃ pitṝṇāṃ saṃśitavrataḥjaratkārurgataḥ svargaṃ sahitaḥ svaiḥ pitāmahaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें