महाभारत 1.138.5
कृच्छ्रेण मातरं त्वेकां सुकुमारीं यशस्विनीम्अवहत्तत्र पृष्ठेन रोधःसु विषमेषु च
kṛcchreṇa mātaraṃ tvekāṃ sukumārīṃ yaśasvinīmavahattatra pṛṣṭhena rodhaḥsu viṣameṣu ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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