महाभारत 1.14.22
गरुडोऽपि यथाकालं जज्ञे पन्नगसूदनःस जातमात्रो विनतां परित्यज्य खमाविशत्
garuḍo'pi yathākālaṃ jajñe pannagasūdanaḥsa jātamātro vinatāṃ parityajya khamāviśat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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