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महाभारत 1.14.7
वरातिसर्गं श्रुत्वैव कश्यपादुत्तमं च तेहर्षादप्रतिमां प्रीतिं प्रापतुः स्म वरस्त्रियौ
varātisargaṃ śrutvaiva kaśyapāduttamaṃ ca teharṣādapratimāṃ prītiṃ prāpatuḥ sma varastriyau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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