महाभारत 1.148.1
कुन्त्युवाचकुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतःविदित्वा अपकर्षेयं शक्यं चेदपकर्षितुम्
kuntyuvācakutomūlamidaṃ duḥkhaṃ jñātumicchāmi tattvataḥviditvā apakarṣeyaṃ śakyaṃ cedapakarṣitum
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें