महाभारत 1.151.23
सव्येन च कटीदेशे गृह्य वाससि पाण्डवःतद्रक्षो द्विगुणं चक्रे नदन्तं भैरवान्रवान्
savyena ca kaṭīdeśe gṛhya vāsasi pāṇḍavaḥtadrakṣo dviguṇaṃ cakre nadantaṃ bhairavānravān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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