महाभारत 1.163.13
नृपतिं त्वभ्यनुज्ञाय वसिष्ठोऽथापचक्रमेसोऽपि राजा गिरौ तस्मिन्विजहारामरोपमः
nṛpatiṃ tvabhyanujñāya vasiṣṭho'thāpacakrameso'pi rājā girau tasminvijahārāmaropamaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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