महाभारत 1.165.30
वसिष्ठ उवाच · vasiṣṭha uvāca
न त्वां त्यजामि कल्याणि स्थीयतां यदि शक्यतेदृढेन दाम्ना बद्ध्वैष वत्सस्ते ह्रियते बलात्
na tvāṃ tyajāmi kalyāṇi sthīyatāṃ yadi śakyatedṛḍhena dāmnā baddhvaiṣa vatsaste hriyate balāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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