महाभारत 1.166.7
अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमःजघान कशया मोहात्तदा राक्षसवन्मुनिम्
amuñcantaṃ tu panthānaṃ tamṛṣiṃ nṛpasattamaḥjaghāna kaśayā mohāttadā rākṣasavanmunim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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