महाभारत 1.167.5
अथ छित्त्वा नदी पाशांस्तस्यारिबलमर्दनसमस्थं तमृषिं कृत्वा विपाशं समवासृजत्
atha chittvā nadī pāśāṃstasyāribalamardanasamasthaṃ tamṛṣiṃ kṛtvā vipāśaṃ samavāsṛjat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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