महाभारत 1.196.5
संप्रीयमाणं त्वां ब्रूयाद्राजन्दुर्योधनं तथाअसकृद्द्रुपदे चैव धृष्टद्युम्ने च भारत
saṃprīyamāṇaṃ tvāṃ brūyādrājanduryodhanaṃ tathāasakṛddrupade caiva dhṛṣṭadyumne ca bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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