महाभारत 1.202.7
ताविन्द्रलोकं निर्जित्य यक्षरक्षोगणांस्तथाखेचराण्यपि भूतानि जिग्यतुस्तीव्रविक्रमौ
tāvindralokaṃ nirjitya yakṣarakṣogaṇāṃstathākhecarāṇyapi bhūtāni jigyatustīvravikramau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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