महाभारत 1.205.16
अनापृच्छ्य च राजानं गते मयि न संशयःअजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवाप्रियं भवेत्
anāpṛcchya ca rājānaṃ gate mayi na saṃśayaḥajātaśatrornṛpatermama caivāpriyaṃ bhavet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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