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महाभारत 1.205.8
ब्राह्मणस्य प्रमत्तस्य हविर्ध्वाङ्क्षैर्विलुप्यतेशार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्शति
brāhmaṇasya pramattasya havirdhvāṅkṣairvilupyateśārdūlasya guhāṃ śūnyāṃ nīcaḥ kroṣṭābhimarśati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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