महाभारत 1.206.23
कथं च नानृतं तत्स्यात्तव चापि प्रियं भवेत्न च पीड्येत मे धर्मस्तथा कुर्यां भुजंगमे
kathaṃ ca nānṛtaṃ tatsyāttava cāpi priyaṃ bhavetna ca pīḍyeta me dharmastathā kuryāṃ bhujaṃgame
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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