महाभारत 1.206.27
परित्राणं च कर्तव्यमार्तानां पृथुलोचनकृत्वा मम परित्राणं तव धर्मो न लुप्यते
paritrāṇaṃ ca kartavyamārtānāṃ pṛthulocanakṛtvā mama paritrāṇaṃ tava dharmo na lupyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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